प्रेम दूसरों के साथ रहने की कला है
और ध्यान स्वयं के साथ रहने की कला.
दोनों एक सिक्के के दो पहलू हैं
दीपावली की शुभकामनाएं 🙏🏻🙏🏻
।।। नमस्ते ।।।
प्रेम दूसरों के साथ रहने की कला है
और ध्यान स्वयं के साथ रहने की कला.
दोनों एक सिक्के के दो पहलू हैं
दीपावली की शुभकामनाएं 🙏🏻🙏🏻
।।। नमस्ते ।।।
दुनिया में सब बुद्धिमान है लेकिन वो सब विषय में कदापि नही हो सकते । एक बच्चा भी मुझसे किसी विषय में बुद्धिमान हो सकता है एक बुजुर्ग भी मुझसे मुर्ख हो सकता है । एक विद्वान् भी मुझसे विद्वान् हो सकता है एक विद्वान् भी मुझसे मुर्ख हो सकता है क्योंकि जीवात्मा अल्पज्ञ है केवल परमात्मा सर्वज्ञ है ।
भास्कर पाठक
9999304525
निराकार आकार के अभाव को कहते हैं । इसे अनुभव कर सकते हैं । समझाना बड़ा ही क्लिष्ट है लेकिन असंभव नहीं । और समझाने के बाद भी कोई समझ जाये ये जरुरी नहीं है । जैसे हमें भूख लगती है इसे आप खुद अनुभव कर सकते हैं दूसरों को बता भी सकते हैं । लेकिन भूख कैसी होती है भूख को समझाना बहुत कठिन है । ऐसे ही सुख है दुःख है दर्द है ये सब बस अनुभव कर सकते हैं । ठीक ऐसे ही ईश्वर भी है उसे खुली आँखों से कभी नहीं देख सकते बस अनुभव कर सकते हैं ।
भास्कर पाठक
9999304525
🌷 महर्षि दयानंद उवाचः ☝
✒.....मनुष्यों का आचरण दो प्रकार का होता है ......एक सत्य और दूसरा झूठ का । अर्थात् जो पुरुष वाणी, मन और शरीर से "सत्य" का आचरण करते हैं वे "देव" कहाते हैं और जो "झूठ" का आचरण करने वाले हैं वे "असुर" "राक्षस" आदि नामों के अधिकारी होते हैं ।
🌷 भावार्थ /यजुर्वेद भाष्य 1/5💐
सुप्रभात । नमस्ते ।
भास्कर पाठक
9999304525
भिद्यते हृदयग्रन्थि:
छिद्यन्ते सर्वसंशया: ।
क्षीयन्ते चास्य कर्माणि
तस्मिन्दृष्टे परावरे ।।
(मुण्डकोपनिषद् 2/1/18)
☝ईश्वर का साक्षात्कार होने पर आत्मा की अविद्या नष्ट हो जाती है । सारे संशय मिट जाते हैं और सारे कुसंस्कारों का नाश हो जाता है ।🌹🙏
सुप्रभात । नमस्ते ।
भास्कर पाठक
9999304525
धृति: क्षमा दमोस्तेयं
शौचमिन्द्रियनिग्रह: ।
धीर्विद्या सत्यमक्रोधो
दशकं धर्मलक्षणम् ।।
(मनु. 6/12)
☝ धैर्य रखना, सहनशील होना, मन को अधर्म से रोकना, चोरी त्याग, राग द्वेष न करना, इन्द्रियों को धर्म में चलाना, बुद्धि बढ़ाना, विद्वान् बनना, सत्याचरण और क्रोध न करना ये दश धर्म के लक्षण है ।
सुप्रभात । नमस्ते ।
भास्कर पाठक
9999304525
भोगा न भुक्ता वयमेव भुक्ता:,
तपो न तप्तं वयमेव तप्ता: ।
कालो न यातो वयमेव याता:,
तृष्णा न जीर्णा वयमेव जीर्णा: ।।
☝☝ हम सांसारिक विषय भोगों का उपभोग नहीं कर पाये, अपितु उन भोगों को प्राप्त करने की चिंता ने हमको भोग लिया ।
🙏 हमने तप नहीं किया, बल्कि आध्यात्मिक, आधिभौतिक, आधिदैविक ताप हम को ही जीवन भर तपाते रहे ।
🌷 भोगों को भोगते भोगते हम काल को नहीं काट पाये, अपितु काल ने हमको ही नष्ट कर दिया ।
🌹 इसी प्रकार भोगों को प्राप्त करने की तृष्णा तो बूढी नहीं हुई अपितु हम ही बूढ़े हो गये ।🙏🙏🙏
🌷 भतृहरि वैराग्य शतकम् 🌷
सुप्रभात । भास्कर पाठक
9999304525